कुत्ते के टीकाकरण का कार्यक्रम

कुत्तों में टीकाकरण उन पिल्लों में संक्रमण को रोकने में सहायक होता है जिनकी रोग प्रतिरोधक क्षमता कमजोर होती है।

तो आप अपने घर में अपने सबसे अच्छे दोस्त को लाए हैं और आप यह सुनिश्चित करना चाहते हैं कि उसे सबसे अच्छा घर, आहार, खिलौने और पशु चिकित्सा मिले। जब छोटे पिल्लों के लिए पशु चिकित्सा की बात आती है, तो यह उनके लिए बहुत ही महत्वपूर्ण समय होता है क्योंकि उनकी प्रतिरक्षा प्रणाली परिपक्व नहीं होती है और उन्हें अपनी माँ के दूध, जिसमें विभिन्न रोगों से लड़ने के लिए एंटीबॉडी होता है, इसके सहयोग के बिना कई बीमारियों से लड़ना पड़ता है। कुत्ते को टीकाकरण पिल्लों को विभिन्न संक्रमण बीमारियों से बचाने में एक बहुत महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है।

सौभाग्य से, हमारे छोटे दोस्तों के लिए, ऐसे टीकाकरण हैं जो गंभीर बीमारियों को रोक सकते हैं और उन्हें जन्म के बाद से 1 वर्ष तक लगातार टीकाकरण की आवश्यकता होती है।

पिल्लों को कौन सा टीकाकरण दें और क्यों?

जब आप एक पंजीकृत कुत्ताघर एक पिल्ला लेते है तो पिल्ले कि उम्र कम से कम आठ हफ्ते होना चाहिए और उनका पहला टीकाकरण कुत्ताघर के द्वारा किया जाना चाहिए।

जब आप एक पिल्ले लें, आपको हमेशा उसके टीकाकरण दस्तावेज के लिए पूछना चाहिए जिससे यह सुनिश्चित हो सके कि टीकाकरण किया गया था और दूसरे टीकाकरण की अगली तारीखें कौन सी हैं।

निम्नलिखित कुछ रोग है जिनके लिए आपके पिल्ले का टीकाकरण होगा:

Bordetella Bronchiseptica कुत्ते का टीकाकरण:

Bordetella Bronchiseptica, कुत्तों में खांसी का एक मुख्य स्रोत है। यह एक अत्यधिक संक्रामक जीवाणु है जिसके कारण गंभीर खाँसी, उल्टी, उबासी, दौरे जैसे गंभीर लक्षण या फिर दुर्लभ मामलों में मृत्यु भी हो सकती है। इस जीवाणु के लिए टीके नाक के स्प्रे और इंजेक्शन के रूप में आसानी से उपलब्ध हैं।

कुत्तों में डिस्टेंपर, हेपेटाइटिस और पैरैनफ्लुएंजा के लिए टीकाकरण:

यह एक संक्रामक, वायु द्वारा फैलने वाला रोग है जो हवा के साथ-साथ किसी भी संक्रमित जानवर के खाने का बर्तन या उपकरण साझा करने से फैलता है।

कुत्तों में डिस्टेंपर तब होता है जब वायरस कुत्तों के तंत्रिका, जठरांत्र और श्वसन लक्षणों को प्रभावित करता है। यह रोग अन्य दूसरे जानवरो में भी पाया जाता है जैसे skunks और रकून।

लक्षणों में पैर की जकड़न, खांसी, बुखार, नाक और आंखों का बहना, दस्त, अधरंग, मरोड़ और अंततः जानवर की मृत्यु शामिल है। इसके कारण आंखों और नाक से स्राव, बुखार, खांसी, उल्टी, दस्त, दौरे, मरोड़, अधरंग और अक्सर मौत हो जाती है। दुर्भाग्य से, कुत्तों में डिस्टेंपर का एकमात्र उपचार रोग के लक्षणों की देखभाल और द्वितीयक कार्यों की रोकथाम है। यदि वह इन लक्षणों से बच जाए तो एक कुत्ते का प्रतिरोधक तंत्र इसके विरुद्ध लड़ सकता है। 

कुत्तों में हेपेटाइटिस, इंसानों में पाए जाने वाले हेपेटाइटिस से संबंधित नहीं है। यह गुर्दे, फेफड़े, तिल्ली, आंखें और कुत्तों के जिगर की एक संक्रामक फैलने वाली बीमारी है। फिर से, इसके लक्षणों का उपचार किया जा सकता है क्योंकि एक कुत्ते में इस रोग का इलाज नहीं किया जा सकता है। अक्सर लक्षणों में, बुखार, उल्टी, पेट का बढ़ना, पीलिया, यकृत के पास दर्द, और संकुचित श्लेष्मा झिल्ली सम्मिलित है।

कुत्तों में पैराफ्लुएंजा कई वायरस में से एक है जो कि कुत्तों में खांसी की बीमारी का कारण बन सकता है।

कोरोना वायरस:

कोरोना वायरस को कुत्ते की जठरांत्र प्रणाली से समाप्त नहीं किया जा सकता है, इस प्रकार, उपचार केवल लक्षणों के आसपास घूमता है। इसका पता करने के लिए, भूख में कमी, ढीले मल, उल्टी और कभी-कभी श्वसन संक्रमण के लक्षणों की तलाश की जा सकती है।

Heartworm:

Heartworm फेफड़ों की धमनियों और हृदय की दाईं तरफ में रह सकता है, और दूसरे हिस्सों में भी पहुंच सकता है जैसे कि जिगर और गुर्दे। प्रत्येक कीड़ा 13 इंच तक लंबा हो सकता है, यदि यह गुच्छे में रहे तो अंगो को चोट पहुंचा सकता है। यद्यपि, हो सकता है कि हाल ही में हुए संक्रमण के कोई लक्षण दिखाई ना दें, बाद के चरणों में, एक संक्रमित कुत्ते को भूख में कमी, आलसीपन, खांसी या सांस लेने में तकलीफ हो सकती है।

Heartworm का उपचार नहीं किया जा सकता लेकिन नियमित और उपयुक्त उपचार से इस बीमारी को रोका जा सकता है। जब आपका पिल्ला 12 से 16 हफ्ते का हो जाए तो आप अपने पशु चिकित्सक से इसके बारे में विचार विमर्श कर सकते हैं।

कुत्तों की खांसी:

ऊपरी वायुमार्ग में एक वायरस से, जीवाणु से या कुछ अन्य संक्रमण से सूजन हो जाती है और इस प्रकार, कुत्तों में खांसी (tracheobronchitis) होती है, जिसके कारण अक्सर कई और संक्रमण हो जाते हैं। यह अत्यधिक संक्रामक है और कुत्ताघार में बंद एक कुत्ते से दूसरे कुत्ते में फ़ैल सकता है। मृदु लक्षणों में सुखी और कठोर खांसी, जो बार बार आती है सम्मिलित है। गंभीर मामलों में, भौंकने में तकलीफ, उल्टी और भूख पर प्रभाव पड़ सकता है। मृदु लक्षणों का इलाज खांसी के उपचार के साथ किया जाता है लेकिन गंभीर लक्षणों में कुछ एंटीबायोटिक दवाओं की आवश्यकता हो सकती है।

Leptospirosis:

जीवाणु से होने वाली बीमारी पूरी दुनिया में कही भी पानी और मिट्टी से हो सकती है। यह कुत्तों से इंसानों को भी हो सकता है। कुत्तों में, उल्टी, दस्त, बुखार, भूख में कमी, सुस्ती / कमज़ोरी, पीलिया, जोड़ों में दर्द, जकड़न, गुर्दे का खराब होना, आदि लक्ष्ण सम्मिलित हैं। 

इस संक्रमण के लिए असरदार एंटीबायोटिक्स उपलब्ध हैं जो जितनी जल्दी सम्भव है उतनी जल्दी देनी चाहिए। 

Lyme रोग:

कुत्तों में Lyme रोग इंसानों से बिल्कुल अलग है। टिक्स के द्वारा वाहित spirochete जीवाणु, कुत्ते को बीमार कर सकते है, यदि लंबे समय तक इसका उपचार ना किया जाए तो यह गुर्दे, हृदय, जोड़ों पर प्रभाव डाल सकता है और कुछ मस्तिष्क संबंधी समस्याएं हो सकती हैं। एक कुत्ता बुखार, भूख में कमी और लंगड़ेपन के लक्षण दिखाता है। इस संक्रमण के उपचार के लिए तुरंत एंटीबायोटिक्स दी जानी चाहिए, हालांकि, कुछ महीनों या सालों में एक कमी दिख सकती है।

Parvovirus:

कुत्ते और पिल्ले जिनका parvovirus के लिए टीकाकरण नहीं हुआ वह बहुत बड़े जोखिम में हैं, यद्यपि कोई और कुत्ता भी इससे संक्रमित हो सकता है।

सामान्यत, संक्रमित कुत्तों में, कम भूख, बुखार और उल्टी देखी जा सकती है। गंभीर मामलों में, तत्काल चिकित्सा सहायता अत्यधिक आवश्यक है क्योंकि एक कुत्ते को खूनी दस्त हो सकता है जो शरीर में पानी की कमी और यहां तक कि मृत्यु का कारण बन सकता है। इस बीमारी का उपचार नहीं हो सकता है, हालांकि, इस उम्मीद के साथ लक्षणों का उपचार किया जाता है, कि कुत्ते का प्रतिरोधक तंत्र वायरस को मारने का काम करेगा।

रेबीज़:

स्तनधारियों में पाई जाने वाली यह संक्रामक बीमारी आसनी से फैल सकती है अगर, एक बीमार जानवर किसी दूसरे को काट ले। यह जानवर के तंत्रिका प्रणाली पर असर कर सकता है, इससे हाइड्रोफोबिया, अधरंग, चिंता, सिरदर्द, भ्रम, और मौत भी हो सकती है। इसकी गंभीरता के कारण शीघ्रता से इसका उपचार आवश्यक है।